दूबलधन महर्षि दुर्वासा की तपोस्थली
कुणाल शर्मा
तीर्थ सरोवर
झज्जर जिले का महाभारत कालीन कस्बा बेरी जहां कौरव-पांडवों की कुलदेवी मां भीमेश्वरी देवी के लिए विख्यात है वहीं इसके साथ लगते गांव दूबलधन को महर्षि दुर्वासा की तपोस्थली होने का गौरव प्राप्त है जहां उन्होंने 80 हजार साल तक कठोर तप किया। उनके द्वारा स्थापित आश्रम में 24 हजार शिष्य शिक्षा प्राप्त करते थे। दुर्वासा के आश्रम के पास ही वह तीर्थ नामक सरोवर है जिसमें शकुंतला की अंगूठी गुम हो गयी थी। इस सरोवर का वर्णन महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ में भी आता है तथा यह सरोवर भारतवर्ष के 68 तीर्थों में गिना जाता है। भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार महर्षि अत्रि और महासती अनसूया ने सौ वर्ष तक जगदीश्वर (जगत को बनाने वाला) को एक समझकर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने एक साथ दर्शन दिये।
उनको देख महर्षि अत्रि और महाशती अनसूया ने कहा कि प्रभु! हमने तो श्रेष्ठ संतान हेतु एक जगदीश्वर की तपस्या की थी, आप तो तीन हैं। आप में से जो भी जगत की रचना करने वाला हो वही हमें श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त होने का वर दे।
तब तीनों ने कहा — हम तीनों ही जगत की रचना करने वाले हैं। तीनों एक ही हैं। हमारे तीनों के अंश से ही तुम्हें एक-एक पुत्र प्राप्त होगा। ब्रह्मा के अंश से सोम, विष्णु से दत्तात्रेय और शिव के अंश से दुर्वासा उत्पन्न हुए। महर्षि दुर्वासा ने बचपन से ही तप का मार्ग चुना और वे माता-पिता की आज्ञा लेकर तप करने के लिए वन में चले गए। उस समय सरस्वती नदी हरियाणा से होकर बहा करती थी जिसके किनारे अनेक ऋषि-मुनियों ने कठोर तप किया। सरस्वती नदी की धारा से हरियाणा में अनेक सरोवरों का निर्माण हुआ। दूबलधन का तीर्थ नामक सरोवर भी उन्हीं में से एक है। जब दुर्वासा तप के लिए उपयुक्त स्थान की तलाश कर रहे थे तो गहरे वन में इस पवित्र सरोवर पर उनकी दृष्टि पड़ी। उन्होंने इसी स्थान को उपयुक्त मानकर शिव की कठोर साधना शुरू की तथा अपना आश्रम भी बनाया। यह भी सर्वविदित है कि महर्षि दुर्वासा अपने नाम के अनुरूप ही भोजन के रूप में केवल हरी दूब का सेवन करते थे। इस जंगल में दूब अत्यधिक मात्रा में थी इस कारण भी महर्षि दुर्वासा ने इस स्थान का चयन किया था। महर्षि दुर्वासा के इस वन में आने से यहां धन की उत्पत्ति भी होने लगी। इसी कारण इस स्थान का नाम दूबलधन पड़ा। इस स्थान पर उस समय महर्षि दुर्वासा का विशाल आश्रम था जहां वे अपने 24 हजार शिष्यों को शिक्षा प्रदान करते थे।
कण्व ऋषि का आश्रम
तीर्थ सरोवर से चार किलोमीटर दूर कथूरा वाले वन में महर्षि कण्व का आश्रम था जहां शकुंतला अपने पालक पिता कण्व ऋषि के साथ रहती थी। महाभारत काल में एक बार महाराजा दुष्यंत वन में शिकार के लिए आये हुए थे। एक मृग का पीछा करते हुए वे कण्व मुनि के आश्रम में जा पहुंचे। आश्रम में वल्कल पहने, सखियों के साथ देवकन्या के समान मनोहर एक स्त्री बैठी हुई थी। उसकी लक्ष्मी के समान अंगकांति से वह आश्रम जगमगा रहा था। शिकार करने आया शिकारी स्वयं शकुंतला के रूप लावण्य का शिकार हो गया। शकुंतला ने दुष्यंत का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। गान्धर्व-विधि से महाराजा दुष्यंत ने उसे ग्रहण किया। कण्व ऋषि ने आकर अपनी सहमति भी दे दी। कुछ दिन वहां रहने के बाद अपनी अंगूठी देकर तथा शीघ्र उसे राजधानी बुलाने को कहकर चले गए।
कई दिनों तक शकुंतला अपने पति के ध्यान में खोई रही। आश्रम में महर्षि दुर्वासा कण्व ऋषि से मिलने आये। उन्होंने आश्रम में आवाज लगाई लेकिन उत्तर न पाकर वे आश्रम में आये जहां शकुंतला दुष्यंत के प्रेम में खोई हुई थी। शकुंतला ने जब महर्षि दुर्वासा का अतिथि सत्कार नहीं किया तब दुर्वासा ने क्रोधित हो उसे शाप दिया— ‘जिसके प्यार में तुम इतनी खोई हुई हो कि आतिथ्य धर्म को ही भूल गई हो, जा वह भी तुम्हें भूल जायेगा। शकुंतला व उसकी सखियों द्वारा अनुनय-विनय करने पर दुर्वासा ने शाप की अवधि को कम करते हुए कहा कि समय आने पर उसकी दी गई निशानी तुम्हारा स्मरण करायेगी।
काफी दिन इंतजार के बाद भी जब महाराजा दुष्यंत का कोई समाचार नहीं आया तब महर्षि कण्व ने अनुमान लगाया कि महाराज राजकार्य में लगकर इधर का ध्यान भूल गये हैं। तब कण्व ने शकुंतला को महाराजा दुष्यंत के पास जाने को कहा तथा उसके साथ अपने दो शिष्य भी भेज दिये। राजमहल जाते समय रास्ते में शुकंतला ने तीर्थ नामक सरोवर के पास विश्राम किया तथा पानी पीते समय अंगूठी उसकी अंगुली से निकलकर तीर्थ सरोवर में जा गिरी। कण्व ऋषि के दोनों शिष्यों सहित शकुंतला राजमहल पहुंची लेकिन महाराजा दुष्यंत ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया।
कण्व ऋषि का आश्रम
जिस तीर्थ जोहड़ में शकुंतला की अंगूठी गुम हो गई थी उसे एक मछली ने निगल लिया। मछुआरों ने जाल डालकर मछलियों को पकड़ लिया। जिसने उसको काटा उसे वह अंगूठी मिली। अंगूठी बेचने वह जौहरी के पास गया। अंगूठी पर राजसी चिन्ह देखकर जौहरी ने उसे कोतवाल को पकड़ा दिया। इस प्रकार वह बंदी होकर राजा के सम्मुख पहुंचा। अंगूठी देखते ही शाप का प्रभाव दूर हो गया। महाराज ने उसे पुरस्कार देकर छोड़ दिया और अंगूठी अपने पास रख ली। अब उन्हें अपने कृत्य पर बड़ा पश्चाताप हुआ। शकुंतला के विरह में वे चिन्तित रहने लगे। शकुंतला का पता चलने पर दुष्यंत उसे व अपने पुत्र भरत को ले आये। महाकवि कालिदास कृत ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ में भी इस तीर्थ का वर्णन मिलता है।
बेरी में भी महर्षि दुर्वासा द्वारा निर्मित देवी का मंदिर है जहां वे हस्तिनापुर की कुलदेवी मां भीमेश्वरी की पूजा-अर्चना के लिए प्रतिदिन बेरी जाते थे। बताया जाता है कि इस तीर्थ की यात्रा श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को भी करायी थी। जिनकी स्मृति में गांव छारा में श्रवण कुमार का मंदिर स्थापित है। यह मंदिर हरियाणा का एकमात्र श्रवण कुमार का मंदिर है। लोक-कथाओं में वनवास के दौरान श्री राम, सीता व लक्ष्मण का भी इस वन में ठहरने का वर्णन मिलता है। इस स्थान को महर्षि दुर्वासा व शृंगी ऋषि की मिलन स्थली के रूप में भी जाना जाता है। दूूबलधन के तीर्थ सरोवर के बारे में कहा जाता है कि इसमें शकुंतला की अंगूठी गुम होने के कारण शकुंतला ने इसी तीर्थ सरोवर को शाप दिया था कि ‘जिस प्रकार महाराजा दुष्यंत मुझे भूल गये हैं कलियुग आने पर लोग तुम्हें भी भूल जायेंगे।’ आज भी यह तीर्थ शकुंतला के दिये शाप से ग्रस्त है। जिस तीर्थ में स्नान मात्र से सारे पाप धुल जाते थे, आज सारे गांव का गंदा पानी इसी तालाब में जमा होता है।